सोमवार, 14 फ़रवरी 2011
गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011
Ek Geet
एक ख़त जो किसी ने लिखा भी नहीं
उम्र भर आंसुओं ने उसे ही पढ़ा
गंध डूबा हुआ एक मीठा सपन
कर गया प्रार्थना के समय आचमन
जब कभी गुनगुनाने लगे बांस वन
और भी बढ़ गया प्यास का आयतन
पीठ पर कांच के घर उठाये हुए
कौन किसके लिए पर्वतों पर चढ़ा ?
जब कभी नाम देना पड़ा प्यास को
मौन ठहरे हुए नील आकाश को
कौन संकेत देता रहा क्या पता
होंठ गाते रहे सिर्फ आभास को
मोम के मंच पर अग्नि की भूमिका
एक नाटक समय ने यही तो गढ़ा
000
उम्र भर आंसुओं ने उसे ही पढ़ा
गंध डूबा हुआ एक मीठा सपन
कर गया प्रार्थना के समय आचमन
जब कभी गुनगुनाने लगे बांस वन
और भी बढ़ गया प्यास का आयतन
पीठ पर कांच के घर उठाये हुए
कौन किसके लिए पर्वतों पर चढ़ा ?
जब कभी नाम देना पड़ा प्यास को
मौन ठहरे हुए नील आकाश को
कौन संकेत देता रहा क्या पता
होंठ गाते रहे सिर्फ आभास को
मोम के मंच पर अग्नि की भूमिका
एक नाटक समय ने यही तो गढ़ा
000
सोमवार, 7 फ़रवरी 2011
Ghazalnuma geet
मैंने जो बात कही थी कभी बरसों पहले
चाहता हूँ कि मेरा दिल वही फिर से कह ले
डूबना है तो ये दरया ये समंदर क्या है
हाँ ज़रूरी है मिले खुद से इजाज़त पहले
वक़्त के खेल तमाशों को जानिए साहब
ताकि सहने न पड़ें नहलों पे झूठे दहले
ये जो चेहरे पे लिए चेहरा चले आते हैं
तू तो इंसान है 'शतदल' इन्हें हंस कर सह ले
०००
चाहता हूँ कि मेरा दिल वही फिर से कह ले
डूबना है तो ये दरया ये समंदर क्या है
हाँ ज़रूरी है मिले खुद से इजाज़त पहले
वक़्त के खेल तमाशों को जानिए साहब
ताकि सहने न पड़ें नहलों पे झूठे दहले
ये जो चेहरे पे लिए चेहरा चले आते हैं
तू तो इंसान है 'शतदल' इन्हें हंस कर सह ले
०००
रविवार, 6 फ़रवरी 2011
GEET
स्वप्न जो भी बंधे रेशमी डोर से
टूट कर गिर पड़ेंगे नयन-कोर से
और फिर हम न जाने कहाँ किस तरह
उम्र के जंगलों का सफ़र तय करें
बिम्ब जो भी उगा एक दर्पण हुआ
किन सुरों में बजे प्राण की बांसुरी
अब हमारे तुम्हारे अधर तय करें
प्यार को प्रार्थना जो नहीं मानते
वे समझ लो स्वयं को नहीं जानते
पीर को राजरानी बना कर जहाँ
रख सकें हम चलो वो नगर तय करें
दिन ढले तो किसी को ठहरना नहीं
शाम को गीत का रूप जिसमें मिले
हम चलो एक ऐसी बहर तय करें
000
शनिवार, 5 फ़रवरी 2011
शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011
मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011
Kavita !
कविता के लिए
भावलोक में
हाथ, पैर, मुंह और
पूरा शारीर पटकते हुए लोग...
एक दिन हो जाते हैं - खाक ,
हो जाते हैं दफ़्न
किसी अंधी सुरंग में .
हमारी किलकारियां ,
गुनगुनाहटें ,
आवाजें और
यहाँ तक कि चीखें
सुरंग के मुहाने पर खड़ी
भीड़ के कानों तक नहीं पहुँच पातीं .
.......भीड़ जो असहाय है ,
भीड़ जो दृष्टी हीन है ( देख नहीं सकती ),
भीड़ जो अपाहिज है,
भीड़ जो जानवर है,
भीड़ एक भ्रम है.
०००
भीड़!
सुरंग के मुहाने पर
करती है - प्रतीक्षा
किसी शब्द - सूर्य की !
.......कहाँ है ऐसा सूरज जो
भीड़ को खुश कर दे.
ले आये हज़ार - हज़ार खुशियाँ
कहाँ है ऐसा सूरज ?
०००
सुरंग के भीतर जा रहे हैं लोग,
सुरंग से बाहर आ रहे हैं लोग,
लेकिन यह क्या !
लोग अपने कन्धों पर सलीब ढो रहे हैं !
.......हाँ , उन्हीं में कुछ हैं जो
हाथों में लाल गुलाब लिए हैं /
भीड़ लाल गुलाब लिए लोगों को देखती है
बड़े अचरज से
स्तब्ध रह जाती है.
.......अंधी सुरंग में गुलाब कहाँ ?
सोचती है भीड़
मन के तहखानों में महसूस करती है - गुलाब!
लेकिन जीवन में खिला - बसा नहीं पाती गुलाब.
बहुत चाह कर भी .......
न उसका रंग , न उसकी कोमलता !
सलीब से बहुत हल्का और कोमल होता है गुलाब
लेकिन सलीब ढोते लोग
चुपचाप कैसे पहुँच जाते हैं पूजा घरों तक?
अपनी मृत्यु का पैगाम ढोकर भी?
०००००००
भावलोक में
हाथ, पैर, मुंह और
पूरा शारीर पटकते हुए लोग...
एक दिन हो जाते हैं - खाक ,
हो जाते हैं दफ़्न
किसी अंधी सुरंग में .
हमारी किलकारियां ,
गुनगुनाहटें ,
आवाजें और
यहाँ तक कि चीखें
सुरंग के मुहाने पर खड़ी
भीड़ के कानों तक नहीं पहुँच पातीं .
.......भीड़ जो असहाय है ,
भीड़ जो दृष्टी हीन है ( देख नहीं सकती ),
भीड़ जो अपाहिज है,
भीड़ जो जानवर है,
भीड़ एक भ्रम है.
०००
भीड़!
सुरंग के मुहाने पर
करती है - प्रतीक्षा
किसी शब्द - सूर्य की !
.......कहाँ है ऐसा सूरज जो
भीड़ को खुश कर दे.
ले आये हज़ार - हज़ार खुशियाँ
कहाँ है ऐसा सूरज ?
०००
सुरंग के भीतर जा रहे हैं लोग,
सुरंग से बाहर आ रहे हैं लोग,
लेकिन यह क्या !
लोग अपने कन्धों पर सलीब ढो रहे हैं !
.......हाँ , उन्हीं में कुछ हैं जो
हाथों में लाल गुलाब लिए हैं /
भीड़ लाल गुलाब लिए लोगों को देखती है
बड़े अचरज से
स्तब्ध रह जाती है.
.......अंधी सुरंग में गुलाब कहाँ ?
सोचती है भीड़
मन के तहखानों में महसूस करती है - गुलाब!
लेकिन जीवन में खिला - बसा नहीं पाती गुलाब.
बहुत चाह कर भी .......
न उसका रंग , न उसकी कोमलता !
सलीब से बहुत हल्का और कोमल होता है गुलाब
लेकिन सलीब ढोते लोग
चुपचाप कैसे पहुँच जाते हैं पूजा घरों तक?
अपनी मृत्यु का पैगाम ढोकर भी?
०००००००
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