गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

Ek Geet

एक ख़त जो किसी ने लिखा भी नहीं 
उम्र भर आंसुओं ने उसे ही पढ़ा 


गंध डूबा हुआ एक मीठा सपन 
कर गया प्रार्थना के समय आचमन 
जब कभी गुनगुनाने लगे बांस वन 
और भी बढ़ गया प्यास का आयतन 


पीठ पर कांच के घर उठाये हुए 
कौन किसके लिए पर्वतों पर चढ़ा ?


जब कभी  नाम देना पड़ा प्यास को 
मौन ठहरे हुए नील आकाश को
कौन संकेत देता रहा क्या पता 
होंठ गाते रहे सिर्फ आभास को 


मोम के मंच पर अग्नि की भूमिका 
एक नाटक समय ने यही तो गढ़ा
000

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

Ghazalnuma geet

मैंने जो बात कही थी कभी बरसों  पहले 
चाहता हूँ कि मेरा दिल वही फिर से कह ले 


डूबना है तो ये दरया ये समंदर क्या है 
हाँ ज़रूरी है मिले खुद से इजाज़त पहले


वक़्त के खेल तमाशों को जानिए साहब 
ताकि सहने न पड़ें नहलों पे झूठे दहले 


ये जो चेहरे पे लिए चेहरा चले आते हैं  
तू तो इंसान है 'शतदल' इन्हें हंस कर सह ले 
००० 

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

GEET

स्वप्न जो भी बंधे रेशमी डोर से
टूट कर गिर पड़ेंगे नयन-कोर से
और फिर हम न जाने कहाँ किस तरह
उम्र के जंगलों का सफ़र तय करें 

जब हमारे अहम् का विसर्जन हुआ 
बिम्ब जो भी उगा एक दर्पण हुआ 
किन सुरों में बजे प्राण की बांसुरी
अब हमारे तुम्हारे अधर तय करें 


प्यार को प्रार्थना जो नहीं  मानते 
वे समझ लो स्वयं को नहीं जानते
पीर को राजरानी बना कर जहाँ 
रख सकें हम चलो वो नगर तय करें 

रोशनी का यहाँ एक झरना नहीं 
दिन ढले तो किसी को ठहरना नहीं 
शाम को गीत का रूप जिसमें मिले 
हम चलो एक ऐसी बहर तय करें 
000

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

Geet

दृग न बोलते जल की भाषा 
तुम न अगर जल का भ्रम होते


मैं मृग हुआ कि मेरे भीतर 
एक मरुस्थल जनम - जनम से
जिसके कारण मैंने फिर ये
जीवन जिया नहीं सय्यम से 


तृप्ति अगर छू जाती इनको 
अधर नहीं ये सरगम होते 
000

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

Ek Geet

गुज़रे हुए समय में झांको 
कोई पल ऐसा है जिसमे 
पूरी एक सदी रहती है/


पल जो सदियों में ढलते हैं
पलकों के नीचे पलते हैं
लेकिन कभी कभी हम इनमें 
आँखें बंद किये चलते हैं 
आँखें खुली रहें तो देखें 
जन्मों से प्यासे अधरों में 
मीठी एक नदी बहती है . 
000 

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

Kavita !

कविता के लिए 
भावलोक में 
हाथ, पैर, मुंह और 
पूरा शारीर पटकते हुए लोग...
एक दिन हो जाते हैं - खाक ,
हो जाते हैं दफ़्न
किसी अंधी सुरंग में .
हमारी किलकारियां ,
गुनगुनाहटें ,
आवाजें और 
यहाँ तक कि चीखें 
सुरंग के मुहाने पर खड़ी
भीड़ के कानों तक नहीं पहुँच पातीं .
.......भीड़ जो असहाय है ,
भीड़ जो दृष्टी हीन है ( देख नहीं सकती ),
भीड़ जो अपाहिज है,
भीड़ जो जानवर है,
भीड़ एक भ्रम है.
०००
भीड़!
सुरंग के मुहाने पर
करती है - प्रतीक्षा 
किसी शब्द - सूर्य की !
.......कहाँ है ऐसा सूरज जो
भीड़ को खुश कर दे.
ले आये हज़ार - हज़ार खुशियाँ 
कहाँ है ऐसा सूरज ?
०००
सुरंग के भीतर जा रहे हैं लोग,
सुरंग से बाहर आ रहे हैं लोग,
लेकिन यह क्या !
लोग अपने कन्धों पर सलीब  ढो रहे हैं !
.......हाँ , उन्हीं में कुछ हैं जो 
हाथों में लाल गुलाब लिए हैं /
भीड़ लाल गुलाब लिए लोगों को देखती है 
बड़े अचरज से 
स्तब्ध रह जाती है.
.......अंधी सुरंग में गुलाब कहाँ ?
सोचती है भीड़ 
मन के तहखानों में महसूस करती है - गुलाब!
लेकिन जीवन में खिला - बसा नहीं पाती गुलाब.
बहुत चाह कर भी .......
न उसका रंग , न उसकी कोमलता !
सलीब से बहुत हल्का और कोमल होता है गुलाब 
लेकिन सलीब ढोते लोग
चुपचाप  कैसे पहुँच जाते हैं पूजा घरों तक?
अपनी मृत्यु का पैगाम ढोकर भी?
०००००००